Saturday, May 23, 2009

जलवायु परिवर्तन एक नयी चुनौती

जितेन्द्र द्विवेदी
अन्तराष्ट्रीय मंचों पर प्राय: विकसित और विकासशील देशों के बीच मूलत: वाद-विवाद का विषय बनकर रह गयी, जलवायु-परिवर्तन की चुनौती भले ही रोजमर्रा की आजीविका के संघर्ष एवं व्यस्त दिनचर्या मेंलीन लोगों के लिए महज खबर या अकादमिक विषय सामग्री मात्र ही हो, सच्चई तो यह है कि हवा, पानी, वाली इस समस्या से देर-सबेर, कम-ज्यादा हम सभी का जीवन प्रभावित होता है । भारत में मौसम बदलाव के एक प्रमुख प्रभाव के रूप में बाढ व सूखे को देखा जा सकता है । देश का बहुत बड़ा क्षैत्र बाढ की विभीषिका को झेलता आ रहा है । परन्तु विगत दो दशकों से बाढ के स्वरूप, प्रवृत्ति व आवृत्ति में व्यापक परिवर्तन देखा जा रहा है । ऐसे बदलाव के चलते कृषि, स्वास्थ्य जीवन यापन आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और जान-माल, उत्पादकता आदि की क्षति का क्रम बढ़ा है । ऐसा नहीं है कि देश के लिए बाढ़ कोई नई बात है परन्तु मौसम में हो रहे बदलाव के इस प्राकृतिक प्रक्रिया की तीव्रता व स्वरूप को बदल दिया है और बाढ़ की भयावहता आपदा के रूप में दिखाई दे रही हैं । इसमें विशेषकर तेज व त्वरित बाढ का आना, पानी का अधिक दिनों तक रूके रहना तथा लम्बे समय तक जल-जमाव की समस्या समाने आ रही है । मौसम बदलाव का दूसरा प्रमुख सूखे के रूप में देखा जा सकता है । तापमान वृद्धि एवं वाष्पीकरण की दर तीव्र होने के परिणाम स्वरूप सूखाग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है । मौसम बदलाव के चलते वर्षा समयानुसार नहीं हो रही है और उसकी मात्रा में भी कमी आई है । मिट्टी की जलग्रहण क्षमता का कम होना भी सूखा का एक प्रमुख कारण है । बहुत से क्षेत्र जो पहले उपजाऊ थे आज बंजर हो चले हैं वहाँ की उत्पादकता समाप्त् हो गई है । भारत के संदर्भ में ही हाल के समय में ग्रीन पीस इण्डिया की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट इस बात को रेखांकित करती है कि भारत में सर्वाधिक आमदनी वाले वर्ग के एक फीसदी लोग सबसे कम आमदनी वाले ३८ फीसदी लोगों के मुकाबले कार्बन डाई आक्साइड का साढ़े चार गुना ज्यादा उत्सर्जन करते हैं । हाल के बाली सम्मेलन में वनों के कटाव पर विशेष चिन्ता प्रकट की गयी थी । ऐसा अनुमान लगाया है कि ग्रीन हाउस गैसे उत्सर्जन के लिए २० से २५ प्रतिशत के लिए वनों के कटाव उत्तरदायी है । इसलिए वनों के संरक्षण पर विशेष बल दिया जाना चाहिए । हमारे एवं हमारी भावी पीढियों के जीवन को निर्णायक रूप से प्रभावित करने वाली जलवायु-परिवर्तन की समस्या हम सबके लिए चुनौती है । इसका सामना सार्थक एवं प्रभावशाली ढंग से करने के लिए हमें जागरूकता दिखाते हुए सरकारों, अन्तराष्ट्रीय मंचाों पर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करते हुए दबाव बनाना होगा । इस दिशा में हो रहे सरकारी, गैर सरकारी संघटनों के प्रयासों में सहयोग देना होगा । व्यक्तिगत जीवन में भी हम सादगी लाने और बिजली, पानी इंर्धन की बचत की दिशा में कदम उठा सकते हैं । लगातार बढ़ता शहरीकरण जलवायु-परिवर्तन को और बढावा देगा और बढ़ती शहरी जनसंख्या के कारण उपजाऊ भूमि इमारतों के निर्माण हेतु उपयोग हो रही है तथा पेड-पौधों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है । भारत में ही १९५५ से २००० के बीच करीब २-३ लाख हेक्टेअर खेती तथा वन भूमि आवासीय उपयोग में आ चुकी है । भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के अनुसार मात्र एक डिग्री सेण्टीग्रेड तापमान में वृद्धि से भारत में ४० से ५० लाख टन गेहूँ की कम उपज का अनुमान है । इससे प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता कम होगी और खाद्य असुरक्षा तथा कुपोषण बढेगा । यदि जलवायु परिवर्तनों को समय रहते कम करने तथा खाद्यान्न उपलब्धता बढ़ाने हेतु प्रभावी कदम नही उठाये गये तो शहरी गरीबों पर इसका गभीर असर पड़ेगा और कुपोषित बच्चें की संख्या और भी अधिक बढ जाएगी । जलवायु-परिवर्तन के चलते सूखे एवं बाढ में वृद्धि से पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी । भारत वातावरणीय परिवर्तनों से होन वाली स्थितियों पर नियंत्रण से संबंधित योजनाआें पर सकल घरेलू उत्पाद का करीब ढाई प्रतिशत खर्च करता है जो कि एक विकासशील देश के लिए काफी बड़ी राशि है । चूँकि जलवायु-परिवर्तन किसी एक देश अथवा क्षेत्र तक सीमित नहीं है इसलिए इनमें कमी लाने हेतु सभी स्तरों पर ठोस उपायों की जरूरत है । भारत में गैर परम्परागत स्रोतों जैसे सूर्य, जल एवं पवन ऊर्जा की काफी बड़ी संभावना है । पवन ऊर्जा पैदा करने की क्षमता में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है । इन साधनों के प्रयोग हेतु प्रोत्साहन से भी वातावरण से कार्बन डाई आक्साइड को सोखने एवं जलवायु-परिवर्तन को कम करने में काफी सहायता है । चूँकि पुराने वृक्षों में कार्बन डाइ्र आक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता कम हो जाती है इसलिए जलवायु-परिवर्तनों के नियंत्रण हेतु प्रत्येक स्तर पर अधिकाधिक वृक्षारोपण को बढावा देने की आवश्यकता है । जलवायु परिवर्तन के कृषि पर तात्कालिक एवं दूरगामी पभावों के अध्ययन की जरूरत है । कृषि वैज्ञानिक भी यहाँ कमी नहीं हैं, लेकिन कृषि वैज्ञानिक भी अभी जलवायु-परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पा रहे है । इसलिए इस दिश में कोई शोध शुरू नहीं हुआ जबकि हमें इस क्षेत्र में तत्काल दो काम करने चाहिए । एक यह कि जलवायु-परिवर्तन से कृषि चक्र पर क्या फर्क पड रहा है । दूसरा क्या इस परिवर्तन की भरपाई कुछ वैकल्पिक फसले लगाकर पूरी की जा सकती है । साथ ही हमें ऐसी किस्म की फसलें विकसित करनी चाहिए जो जलवायु-परिवर्तन के खतरों से निपटने में सक्षम हो-मसलन फसलों की ऐसी किस्मों का ईजाद, जो ज्यादा गरमी, कम या ज्यादा बारिश सहन करने में सक्षम हों । यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जलवायु-परिवर्तन न केवल कृषि के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए एक खतरे के रूप में सामने आया है और इसलिए इसे सीमा में बांधना बेईमानी होगी । कोई भी देश इसकी ऑच से बच नहीं सकता । हम इस तथ्य से भी मुँह नहीं मोड सकते कि जलवायु-परिवर्तन के मुद्दे पर अब शिखर सम्मेलनों के आयोजन की अपेक्षा जमीनी स्तर पर विचार किया जाना चाहिये । हम यह भी उम्मीद करेंगे कि अगले दो सालों के भीतर दुनिया के समस्त देश इस गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए एकजुट होकर वर्ष २००९ की डेनमार्क में कोेपेन हेगन वार्ता में कोई ऐसा सर्व सम्मत एजेंडा विश्व के समक्ष रखने में समर्थ होंगे जो २०१२ में समाप्त् होने वाले क्योटो प्रोटोकाल का स्थान ले और उसमें विशेष रूप से कृषि पर पडने वाले जलवायु-परिवर्तन के प्रभाव को कम करने की प्रभावी व्यवस्था भी शामिल हो।

Thursday, October 16, 2008

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के मामले में भारतीय कंपनियां अब ज्यादा जागरूक हो गई हैं। धरती को ग्रीन हाउस गैसों के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए यहां की करीब 21 फीसदी कंपनियों ने प्रयास शुरू कर दिए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 55-60 फीसदी के औसत को देखते हुए यह बहुत कम है, लेकिन 2 साल पहले इस मामले में भारतीय कंपनियों का अनुपात सिर्फ 10 फीसदी होने की तुलना में यह बहुत अच्छी उपलब्धि है। वाणिज्य एवं उद्योग चैम्बर एसोचैम के सर्वेक्षण में यह जानकारी सामने आई है।
एसोचैम के इस सर्वेक्षण में शीर्ष 180 कंपनियों के 240 कर्मचारियों के विचार जाने गए। सर्वेक्षण के अनुसार, 21 फीसदी कंपनियों ने अमेरिका, यूरोपीय संघ और आसियान जैसे जलवायु परिवर्तन से प्रभावित प्रमुख क्षेत्रों में इस समस्या से निपटने में सहयोग करने के लिए विकसित देशों के साथ साझेदारी की है। भारतीय कंपनियों द्वारा किए जा रहे इस तरह के प्रयासों को उक्त क्षेत्रों की 60 फीसदी से ज्यादा कंपनियों का पूरा समर्थन मिल रहा है। सर्वेक्षण में शामिल लोगों ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के घातक प्रभावों से पर्यावरण को बचाने के लिए उक्त देशों में चल रहे पीपीपी मॉडल सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन भारत में कॉरपोरेट जगत और सरकार के बीच साझेदारी अभी सही गति नहीं पकड़ पाई है।
सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी करते हुए एसोचैम के अध्यक्ष सज्जन जिंदल ने कहा, 'विभिन्न सरकारी और निजी क्षेत्रों के 7 से 10 फीसदी कर्मचारियों ने इस मसले को गंभीरता से लिया है और वे उद्योग एवं समाज के साथ मिलकर इसके लिए काम भी करना चाहते हैं। सरकार, कॉरपोरेट कंपनियों एवं एनजीओ ने जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिन्ग से जुड़े अभियान मेट्रो शहरों, छोटे शहरों एवं गांवों तक में शुरू किए हैं।' सर्वेक्षण में यह चेतावनी भी दी गई है कि अभी 79 फीसदी घरेलू कंपनियां अपने विस्तार योजनाओं और प्रसार को पहली प्राथमिकता दे रही हैं और जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिन्ग की समस्या उनकी प्राथमिकता में दूसरे स्थान पर आती है। इस तरह की प्रवृत्ति कंपनियों के लिए नुकसानदेह हो सकती है और भविष्य में उन्हें इस पर ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ सकती है।
जिंदल ने भारतीय कंपनियों से अनुरोध किया कि वे खुद आगे आते हुए अपनी सालाना आमदनी का एक निश्चित हिस्सा जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने के लिए खर्च करें। सर्वेक्षण में शामिल 70 फीसदी लोगों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से कृषि, वानिकी, यातायात और ऊर्जा क्षेत्र की बढ़त को चोट पहुंच सकती है। 75 फीसदी कंपनियों ने प्राकृतिक गैस और अक्षय ऊर्जा स्त्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देने की मांग की। सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश कंपनियां चाहती हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए समन्वित अभियान चलाया जाए। अधिकांश कंपनियां जलवायु परिवर्तन के महत्व को समझ चुकी हैं और इसके दुष्प्रभावों को समझने के लिए सहकारी या समन्वित प्रयास में शामिल होने की इच्छुक हैं। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए कई कंपनियों ने रणनीति तैयार करनी भी शुरू कर दी है। कई मैन्यूफैक्चरिंग इकाइयों में बड़े पैमाने पर पौधे लगाए जा रहे हैं और औद्योगिक कचरे के निपटारे की ऐसी व्यवस्था की जा रही है जिससे पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को कम से कम नुकसान हो। सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश लोगों का यह भी कहना था कि उक्त सभी प्रयासों के साथ ही ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को तेजी से कम करने वाले नए एवं स्वच्छ प्रौद्योगिकी के अनुसंधान एवं विकास में निवेश करना चाहिए। गौरतलब है कि कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, जल वाष्प, ओजोन जैसी गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है।
प्रीती द्विवेदी

पूरी सच नहींहैं खाद्यान्न संकट की बातें

डॉ शिराज़ वाजिह गोरखपुर एन्विरोंमेंतल एक्शन में निदेशक हैं। यह संस्थां खाद्य सुरक्षा, कृषि और पोषण जैसे मुद्दों पर विभिन्न देशों की नीतियों का अध्ययन करता है और उन्हें सुझाव देता है। महंगाई के इस दौर में भारत एवं विश्व में अनाज के उत्पादन, भंडारण आपूर्ति, कीमत एवं नीतियों आदि को लेकर संवाददाता प्रीती द्विवेदी ने उनसे बातचीत की। पेश हैं इसके प्रमुखअंश-

मौजूदा वैश्विक खाद्य संकट को आप किस प्रकार देखते हैं? यह कितना वास्तविक है?

यह संकट पूरी तरह अवास्तविक नहीं है। इसमें कुछ हद तक सच्चाई है, लेकिन जिस तरह से पूरी दुनिया में एक अफरातफरी का माहौल बनाया जा रहा है उसकी भी जरूरत नहीं है। खास तौर पर भारत में जिस तरह से खाद्य कीमतों और इसके संकट को लेकर तरह-तरह की बातें आ रही हैं उनमें अधिकांश सच्चाई पर आधारित नहीं है। दुनिया के अन्य देशों से तुलना करें तो भारत में खाद्य आधारित मुद्रास्फीति की दर एक तिहाई या एक चौथाई भर है। मेरा मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत सरकार ने खाद्यान्न की कीमतों पर जो नीति अपनाई है वह काबिलेतारीफ है। सरकार की नीतियों ने वैश्विक संकट से देश को बहुत हद तक बचा कर रखा हुआ है। खाने-पीने की चीजों की कीमतों को लेकर जो विवाद खड़ा किया गया है उसमें 80 फीसदी राजनीतिक हाथ है। वे लोग ही शोर मचा रहे हैं जो इसके बारे में ज्यादा नहीं जानते। तो क्या भारत में खाद्यान्न कीमतें ज्यादा नहीं बढ़ी हैं?

देखिए इस प्रश्न का जवाब जानने से पहले आपको कुछ तथ्यों को जानना होगा। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि पिछले वित्त वर्ष के दौरान भी भारत अनाज का शुद्ध निर्यातक रहा है। इस संकट के वर्ष भी हमने 40 लाख टन चावल और 20 लाख टन मक्के का निर्यात किया है। केवल 18 लाख टन गेहूं आयात किया गया है। इसके पिछले वर्ष 6000 करोड़ रुपये का गेहूं आयात किया, जबकि 7000 करोड़ रुपये का चावल निर्यात किया। इससे पहले 2002 से 2005 तक भारत अनाज निर्यात में विश्व के सबसे प्रमुख देशों में था। आप कहते हैं कि देश में खाने-पीने की चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि आज उत्तर प्रदेश का किसान एक रुपये प्रति किलो की दर से आलू बेच रहा है। नासिक में किसानों को प्याज के लिए दो रुपये किलो के भाव दिए जा रहे हैं। यह भी याद रखिये कि वर्ष 1995-96 से वर्ष 2005-06 तक खाद्यान्नों की कीमतें या तो स्थिर रही हैं या फिर इनमें बेहद मामूली वृद्धि देखी गई है। पूरे एक दशक तक कीमतों के स्थिर रहने के बाद जब इनमें वृद्धि का रुख बना है तो इसको एक ज्वलंत मुद्दा बनाने की जरूरत नहीं है।
मुद्रास्फीति की बढ़ती दर की वजह क्या खाद्यान्नों की महंगाई नहीं है?
सच है कि मुद्रास्फीति की दर बढ़ रही है, लेकिन इसमें खाद्यान्न की कीमतों की भूमिका केवल 20 फीसदी है। मेरा तो यह भी मानना है कि खाद्यान्न की कीमतों को डालर में आंकना बंद करना चाहिए। डालर पिछले दो वर्षो से अस्थिर बना हुआ है। इसलिए डालर में कीमतों की तुलना करने पर यह बहुत ज्यादा दिखाई देती हैं। अगर यूरो में अनाजों की कीमतों को लें तो आप पाएंगे कि वर्ष 1996 के बाद से इनकी कीमतें लगभग स्थिर रही हैं। इसलिए कीमत मापने के हमारे तरीके में बदलाव लाने की जरूरत है। मुद्रास्फीति की दर वैसे भी स्टील, सीमेंट जैसे उत्पादों की कीमतों से ज्यादा प्रभावित होती है। वैश्विक खाद्यान्न संकट के लिए भारत को जिम्मेदार माना जा रहा है। इसमें कितनी सच्चाई है?

यह प्राकृतिक तथ्य है, जब लोग ज्यादा कमाने लगते हैं तो वे खान-पान पर ज्यादा खर्च करने लगते हैं। इसका यह मतलब नहीं हुआ कि भारत और चीन ही वैश्विक खाद्यान्न संकट के लिए जिम्मेदार हैं। इसके पीछे आपूर्ति के साथ ही मांग से जुड़े कारकों ने भी मुख्य भूमिका निभाई है। आस्ट्रेलिया, यूरोप सहित कई क्षेत्रों में सूखा होने से स्थिति गंभीर हुई है। तीन वर्षो के भीतर आस्ट्रेलिया में गेहूं का उत्पादन 2.5 करोड़ टन से घटकर एक करोड़ टन रह गया है। यूरोपीय संघ में 3-4 वर्षो में गेहूं का उत्पादन 15 फीसदी तक कम हो गया है। मांग पक्ष को तो सबसे ज्यादा भारत और चीन प्रभावित कर रहे हैं। वर्ष 2004 तक इन दोनों देशों में गेहूं का इतना ज्यादा भंडार था कि इन्होंने औने-पौने दामों में इसे निर्यात किया। इस दौरान इन दोनों देशों के किसानों ने गेहूं छोड़कर गन्ना उपजाना शुरू कर दिया, इससे चीनी की कीमतें लुढ़क गई। अमेरिका में बायोफ्यूल को लेकर खूब अनुसंधान हुए। आज अमेरिका 60-70 फीसदी मक्का बायो-फ्यूल में लगा रहा है। इससे भी संकट बढ़ा। साथ ही जिंस बाजार में जमकर निवेश होने से सटोरियो ने भ्रामक प्रचार फैलाकर कमाई की। इन सब कारणों ने संकट को गहराने का काम किया।
इस बार गेहूं की सरकारी खरीद जमकर हुई है। क्या इससे स्थिति सुधरेगी?
मेरा मानना है कि सरकार को जरूरत से ज्यादा गेहूं की खरीद नहीं करनी चाहिए। यह समस्या को हमेशा के लिए सुलझाने नहीं जा रहा है। जब तक कीमत निर्धारित करने का काम बाजार के तरीके से नहीं होगा, न तो किसानों का भला होगा और न ही ग्राहकों का। जन वितरण प्रणाली और स्टाक के लिए खरीद करने के बाद सरकार को बाजार से हट जाना चाहिए। किसानों को उनके उत्पादों की सही कीमत मिलने का रास्ता तैयार करना चाहिए। आप किसानों को ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध कराइये, उनके लिए उचित भंडारण की व्यवस्था कीजिए, सड़कें बनाइए ताकि सही बाजार में उनके उत्पाद पहुंच सकें, लेकिन कीमत निर्धारित करने का काम बाजार पर छोड़िये। नहीं तो कभी गन्ना तो कभी गेहूं उपजा कर किसान पछताते रहेंगे। वायदा कारोबार पर पाबंदी लगा देने का भी विपरीत असर होगा। यह भी जल्दबाजी में उठाया गया कदम है।
इससे क्या गरीब तबके का हित प्रभावित नहीं होगा?
उसके लिए आपको व्यवस्था करनी होगी। ज्यादा मजबूत और पुरजोर व्यवस्था करनी होगी। जन वितरण प्रणाली को सुधारिए। लक्षित जनों तक सस्ता राशन पहुंचाने के लिए दूसरा रास्ता अपनाइए। आखिरकार आंध्र प्रदेश में दो रुपये प्रति किलो चावल दिया जा रहा है या नहीं। हम भी कुछ ऐसा कर सकते हैं। जिस वर्ग को वाकई सस्ते अनाज की जरूरत है उस तक अनाज पहुंचाने का कोई कारगर रास्ता अपनाना होगा। सरकारी दर पर गेहूं-चावल खरीद कर एफसीआई के गोदामों में भरने का कोई फायदा नहीं होगा।
इस तरह की स्थिति फिर पैदा न हो इसके लिए सरकार को क्या करना चाहिए? सबसे पहले तो ढांचागत सुविधाओं को बेहतर बनाना होगा। किसानों को बिजली, पानी, सड़क, भंडारण की सुविधाएं देनी होगीं। भारत में तो कृषि क्षेत्र में बहुत ज्यादा राशि लगाने की आवश्यकता है। यह काम सरकार अकेले नहीं कर सकती। निजी क्षेत्र को कृषि क्षेत्र में निवेश करने के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहन देने की जरूरत है। अभी अनाज उत्पादन तो पूरी तरह से निजी तौर पर हो रहा है, लेकिन इसकी मार्केटिंग पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है। यह स्थिति समाप्त होनी चाहिए।

प्रीती द्विवेदी

GEAG expresses concern over emerging food security crisis

Times of India, Gorakhpur
16 October, 2008
Gorakhpur Environmental Action group (GEAG), a voluntary organization working for sustainable agriculture, expressed great concern over the emerging food security crisis.
To make the common people aware about this problem, the food and agriculture organization(fao) of United Nations, which has its branches in 150 countries of the world, world organize several programmes on October16, the World Food Day with this year’s theme being “World Food Crisis: Climate change and bio-energy”.
GEAG President, S.A.Wajih said that presently there were 7.5 crore people in the world who could be categorized as ‘hungry persons’ but this number could multiply in days to come if prices of food items increased at the present rate. The food production in the world is worst affected by the climate change, he noted.
The scenario in India regarding food crisis is more alarming than that in the western world. About 50 percent of the hungry persons of the world reside in the India alone and 46 percent of children below the age of 3 years are suffering from malnutrition. The situation of Uttar Pradesh is more pathetic as it has the maximum number of children suffering with malnutrition, he said.
The agricultural production in India is largely dependent on climate besides the technical advancement in other fields of development. The UN has long urged India to give more importance to agricultural production and water management. Though growth of GDP in India was 8.5 percent in last financial year but agricultural growth rate was only 2.6 percent.
Immediate attention should be paid to increase the agricultural production, he said.

Jitendra Dwivedi
Media Coordinator
Gorakhpur Environmental Action Group

Tuesday, October 14, 2008

खाद्य सुरक्षा पर गहराता संकट


आहार का आभाव गरीबी का शायद सर्वाधिक तात्कालिक, स्वाभाविक और सहवर्ती लक्षण है। लेकिन आहार आवश्यकताओं या भोजन के अधिकार की धारणा को विकसित रूप से समझने की आवश्यकता है, ताकी यह जाना जा सके की इसे कैसे बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार अभी तक विश्व में भूखों की संख्या ७.५ करोड़ है और यदि अनाज के दामों की यह बढ़त जारी रही तो यह संख्या बढ़कर ९२।२५ करोड़ हो सकती है. इस संगठन की स्थापना १६ अक्टूबर १९४५ में की गई थी। इस संगठन की स्थापना के दिन ही विश्व के करीब १५० देशों ने १६ अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस के रूप में घोषित कर दिया। इस साल खाद्य दिवस की थीम रखी गयी है, ‘विश्व खाद्य संकट: जलवायु परिवर्तन की चुनौती और जैव उर्जा।’ इसमें कोई दो राए नहीं की वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन का सीधा असर कृषि पर पड़ रहा है, जिसका सीधा सम्बन्ध खाद्य सुरक्षा से है क्योंकि भारत सदियों से कृषि प्रधान देश रहा है। बढती कीमतों की वजह से वैश्विक स्तर पर वर्ष २००७ में करीब २.५ अरब भूख से ग्रसित लोगों में वृद्धि हुई है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी की गई ‘ सहस्त्राब्दी घोषना पत्र भी वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा के संकट को कम करने में असफल रहा है। जबकी ‘ सहस्त्राब्दी घोषना पत्र की खाद्य संकट से निपटना उच्च प्राथमिकता थी।
तेल की बढ़ती कीमतों तथा अस्थिर अर्थव्यवस्था ने विकासशील देशों में खाद्यान संकट को और भी गंभीर बना दिया है। वर्ष २००७ में गेहूं की कीमतों में बढोत्तरी देखि गयी है। विश्व के दो प्रमुख गेहूं उत्पादक देश आष्ट्रेलिया और यूरोप नें गंभीर सूखे की मार झेली है। यद्यपी की वैश्विक स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को एक मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। किंतु विश्व के कुल भूख से पीड़ित लोगों में अकेले भारत में ही ५० प्रतिशत लोग रहते हैं। भारत की कुल जनसँख्या की २५ प्रतिशत लोगों की आमदनी प्रतिदिन १२ रूपये से भी कम है और करीब ७५ प्रतिशत लोगों की आमदनी एक डालर से भी कम है। भारत की करीब ८० प्रतिशत जनसँख्या को कम से कम पोषक आहार की मात्र भी प्राप्त नहीं नसीब होती है। भारत के ०-३ वर्ष के करीब ४६ प्रतिशत बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं। वहीँ उत्तर प्रदेश में यह आंकडा ४७ प्रतिशत है जहाँ देश के सबसे ज्यादा बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं।
तमाम तकनीकी विकास के बावजूद भी भारत की अधिकतर कृषि मौसम के ऊपर निर्भर है। भारत को सार्वजानिक वितरण प्रडाली को भी मजबूत बनाने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के निदेशक डाक्टर जैकुस दिओउस ने विश्व के लोगों से अनुरोध किया है की वह अपने देश की कृषि उत्पादकता और जल प्रबंधन पर पर्याप्त ध्यान दें। खाद्य सामग्री की कमी को देखते हुए राज्य सरकार को कमजोर वर्ग की तरफ़ ज्यादा ध्यान देना चाहिए क्योंकि खाद्य संकट का सबसे बुरा असर इसी वर्ग पर पड़ता है. यह बड़े दुर्भाग्य का विषय है की कृषि प्रधान देश होते हुए भी भारत को खाद्य संकट से गुजरना पड़ रहा है।
इस सम्बन्ध में गोरखपुर इन्वायरमेंटल एक्शन ग्रुप के अध्यक्ष डाक्टर शिराज ऐ वजीह का कहना है “ की यह बात सत्य है की पिछले वर्षो में भारतीय आर्थव्यवस्था के सकल घरेलु उत्पाद में ८.५ प्रतिशत की वृद्धि हुई है किंतु कृषि खेत्र में विकास की यह दर मात्र २.६ प्रतिशत रही है। उद्योगों को प्रोत्साहित करने और विशेष आर्थिक खेत्र के तहत ज्यादा से ज्यादा कृषि योग्य भूमी पर अधिग्रहण से कृषि उत्पादकता में कमी आयी है। उनका आगे कहना है की चुकी आहार एक अधिकार है अतः यह राज्य के लिए अनिवार्य है की वह इस बारे में एक निति और वैधानिक ढांचा कायम करे की सामाजिक भौगोलिक या अन्य विभिन्न घटकों जैसे की कृषि सब्सिडी इत्यादी में उनके अधिकार को और सुरक्षित किया जाए। भूख से मुक्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। भोजन के आभाव के रूप में भूख एक ऐसे स्थिति है जिसे अवश्य समाप्त कर देना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं की जिन्हें भूख की बेचैनी महसूस नहीं होती उन्हें अच्छा - खासा भोजन प्राप्त होता है। इसलिए आहार की आवश्यकता पर पर्याप्तता बल दिया जाना।

Wednesday, April 16, 2008

Implication of residue losses of wheat/paddy due to its burning vis a vis buffering of dry fodder by practicing manual oepareshan


Jitendra Dwivedi
Coordinator
Gorakhpur Environmental Action Group (GEAG)
In Indian economy, especially Indo-Gangetic plain region the major share of occurred by the farming of rice-wheat cropping system. Rice-Wheat rotation has emerged as the most important food production system in the Eastern U.P. too. Besides being a main stay of food security system of India, it provides livelihood to million of families. The sustainability of this system is, however, threatened by decline/stagnation in productivity, dwindling water resources, multi nutritional deficiencies, high energy input, declining soil health and other environmental problems. Recently, prevalent tillage and residue management practices employed in this system have become a critical issue because of escalating energy cost, environmental pollution and loss of plant nutrients caused by burning of crop residues .Gorakhpur district of Eastern UP stands much promising for the production of wheat and paddy and having sizable acreage which generates the potential income and employment of this region. Similarly Gorakhpur district emerges the present effect of mechanical / combines harvesting of paddy and wheat and resulting consequent effect in terms of ill health of soil, environmental issues and soil nutrient losses occurring in short term/long term basis. As traditional manual harvesting practices incorporated all the merits in favouring to supplying fodder to livestock’s without spoiling the soil health and environmental status. Mechanical operation having only merit to reduce a little bit of cost expenditure per acre basis along with compensating dependence on manual labour during peak season of paddy and wheat. Looking to these facts the present investigation attempted to analyse comparative analysis of losses of residue burning and its consequent effect to the soil/environmental status vis a vis manual labour harvesting of paddy and wheat. Methodology:For the study a detail methodology was incorporated as follows. Frequent visit and focal group discussion were made and randomly procure the information from the farmer’s fields, to asses the variability in prevalent residue management practices at the surrounding of the Gorakhpur district under the jurisdiction of Gorakhpur Environmental Action Group (GEAG). The real fact of information conceived and exposed the very pertinent information related to net residue loss, soil nutrient loss, specially carbon, nitrogen, phosphorus, potash, and sulphur, degeneration of bacterial composition of soil and quantum of soil loss. Estimation of losses Aspect Per hec. Rs.In Gorakhpur as a whole Rs.Residue use value20 qt.@ 100/qt. = 2000 (in form of fodder)93630 ha.× 20 = 1872600qt187260000
Nutrient Carbon1000 Kg. -936300-Nitrogen 15 Kg. (33 Kg. Urea) 19830897.90 Qt. 18538740Phosphorus .5 Kg. (1.08 Kg. DAP)111011.20 Qt.1011204Potash 8.75 Kg. (15 Kg MOP)7514044.50 Qt.7022250Sulphur1.2 Kg. (1.5 Kg. Sulphur 901404.45 Qt.6741360Total 374983658.05 Qt.3,33,13,554
It is evident from the table 4 that per hectare residue burnt after mechanical operation accounted i.e. 20 qt. where as per hectare nutrient loss as available in residue of wheat/paddy resulted in the form of carbon was estimated 1000 Kg, Nitrogen 15 Kg, Phosphorus 0.5 kg, potash 8.75 Kg and Sulphur 1.2 Kg. so far. How ever, in value form as corresponded nutrient loss of nitrogen as was Rs. 198, followed by Rs. 90 (Sulphur) Rs. 75 (Potash) and Rs. 11 (phosphorus), respectively. Along with total nutrient losses valued in Rs. 374/hectare In respect of Gorakhpur district as a whole, the total residue burnt after mechanical operation was accounted i.e. 1872600 quintal. Where as nutrient losses as a whole were found carbon 936300 quintal, nitrogen 30897.90 quintal, phosphorus 1011.20 quintal, potash 14044.50 quintal and sulphur 1404.45 quintal. so for. However in value form as corresponded nutrient loss was Rs. 18538740 of nitrogen, Rs. 1011204 (phosphorus), Rs. 7022250 (Potash) and Rs. 6741360 (sulphur) respectively along with total nutrient losses as a whole valued in Rs. 33313554 (approx Three Crore Thirty three lakhs) Input analysis: (Mechanical/manual harvesting) Input/acre (Wheat) Mechanical (Rs.)Manual (Rs.)Difference (Rs.)Labour (harvesting & therasing) 800-850Man days per day15 × 50 = 75004 × 25 = 100-Tractor charges 1000 Fodder loss 9 quintal = 900 -Total17251850125
Table 5 BIt is obvious from table that by employing mechanical operation for harvesting of wheat was estimated Rs. 1725/acre where as, by manual operation the harvesting of wheat was accounted Rs. 1850/acre. By comparing mechanical verses manual operation of wheat was accounted i.e. Rs. 125/acre as favouring lowering cost in corporate in mechanical operation Input/acre (Paddy) Mechanical (Rs.)Manual (Rs.)Difference (Rs.)Labour (harvesting & therasing) 800-85014 ×50 = 70005 × 50 = 250-Tractor charges 300 Fodder loss 9 quintal = 900 --Total17251250475
In respect of harvesting of paddy was estimated Rs। 1725/acre where as, as by manual operation the harvesting of paddy was accounted Rs. 1250/acre. by comparing of mechanical verses manual operation of paddy was accounted i.e. Rs. 475 as favouring lowering cost incorporated in manual operation.

Friday, February 1, 2008

Official group moots Rs 7,000 cr investment in agriculture

Official group moots Rs 7,000 cr investment in agriculture
Bangalore (PTI): An Official Group set by Karnataka Government has recommended setting up of a "Karnataka Agriculture Mission" and an investment of Rs 7,000 crore to promote development of agriculture and allied activities in the state.
The Group in its report submitted to Governor Rameshwar Thakur today, has called for implementation of a multi-pronged strategy for improving the economic condition of farmers.
The 12-member official group headed by Principal Secretary, Finance Department, M R Srinivasa Murthy, was constituted in June last year by the then Chief Minister H D Kumaraswamy to suggest measures to improve farmers economic conditions after the state witnessed a spate of suicides by farmers.
The Group has recommended implementation of "The Group Approach to farming" by organizing farmers into groups in every village for taking up cultivation of commonly agreed crops, dairy farming, horticulture etc.
This would enable the farmers' group to obtain loans from financial institutions and technical advice from various extension agencies more easily.
Diversification of farming is another strategy advocated by the group to reduce risks and increase incomes of farmers.
The group has recommended adoption of the motto "no field with one crop and no farmer with a single income" to create multiple sources of farm income, official sourcrces said.
The Group in its report had recommended that each farmer's household should be enabled to create for itself at least two or three sources of sustainable income so that the risk of crop failures with the resultant distress is avoided.
It has strongly advocated that as part of the financial inclusion programme being pursued by Banks, the credit needs of every household of farmers should be fully addressed by the Banks.
"Only universal access to agricultural credit will enable small farmers to modernize their agricultural practices and derive higher incomes", it suggested.
Recognizing the need for making huge investments in the sector of processing and marketing infrastructure, the Group has recommended that private enterprise must be supported in developing marketing and processing infrastructure.
It suggested that the funds available to the state under the National Agricultural Development Programme along with state's own resources should be used over the next five years to invest about Rs 7,000 crore for developing the agricultural sector. A provision of revolving fund should be made to enable farmers' groups to meet their emergency cash needs for urgent medical expenses among others.